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आज संदूक़ से वो!
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार
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आज सय्याद को !
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार
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मेरी कुछ और रचनाएं-3
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…
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मैं रहूँ या न रहूँ!
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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तू मिरे साथ अगर है !
तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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ख़ुशनुमा लगते हैं!
ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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अभी दुनिया हमें!
हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता,अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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जैसे सावन के महीने!
ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी,जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है| मुनव्वर राना