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कोई उम्र गुज़ारे कैसे!
हम ने ढूँडें भी तो ढूँडें हैं सहारे कैसे,इन सराबों पे कोई उम्र गुज़ारे कैसे| जावेद अख़्तर
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कि सारे खोने के ग़म!
मिसाल इस की कहाँ है कोई ज़माने में,कि सारे खोने के ग़म पाए हम ने पाने में| जावेद अख़्तर
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वही है का’बे में!
नज़र के ज़ाविए बदले है और कुछ भी नहीं,वही है का’बे में जो ‘नूर’ सोमनाथ में है| कृष्ण बिहारी नूर
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बस अब तो ‘इश्क़ है!
बस अब तो ‘इश्क़ है हिज्र-ओ-विसाल कुछ भी नहीं,ये टुकड़ा ज़ीस्त का दिन में है और न रात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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पुलिस अफसर!
आज मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नागार्जुन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता – जिनके बूटों से कीलित है, भारत माँ की छातीजिनके दीपों में जलती है, तरुण आँत की बाती ताज़ा मुंडों…
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उसी तरह की झिझक!
गुनाह भी कोई जैसे करे डरे भी बहुत,उसी तरह की झिझक उस की बात बात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह वो परेशाँ !
कि जैसे झूट कई झूट के सहारे ले,उसी तरह वो परेशाँ तकल्लुफ़ात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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उसी तरह की महक!
कि जैसे बू-ए-वफ़ा ख़ुद-सुपुर्दगी में मिले,उसी तरह की महक उस की इल्तिफ़ात में है| कृष्ण बिहारी नूर
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कि जैसे वक़्त गुज़रने!
कि जैसे वक़्त गुज़रने का कुछ न हो एहसास,उसी तरह वो शरीक-ए-सफ़र हयात में है| कृष्ण बिहारी नूर