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जब दुपहरी ज़िन्दगी पर!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता – जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज़ सूरजएक जॉबर-साबराबर रौब अपना गाँठता-सा हैकि रोज़ी छूटने का डर हमेंफटकारता-सा…
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अपने अलावा किस को!
भीड़ ने यूँही रहबर मान लिया है वर्ना,अपने अलावा किस को घर पहुँचाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी
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जिनसे सारी दुनिया को!
ख़ुद भी आख़िर-कार उन्ही वा’दों से बहले,जिन से सारी दुनिया को बहलाया हम ने| शारिक़ कैफ़ी
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तुझे हम वली समझते!
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’,तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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कारवाँ गुज़र गया-9
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में नीरज जी के लिखे इस अत्यंत लोकप्रिय गीत का अंतिम भाग अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- कारवाँ गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे – अंतिम भाग आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *****
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न कभी जनाज़ा उठता!
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया,न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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अगर एक बार होता!
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है,मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता| मिर्ज़ा ग़ालिब
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तोरा मन दर्पण कहलाए!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में, ‘काजल’ फिल्म के लिए आशा भौंस्ले जी का गाया यह भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ- तोरा मन दर्पण कहलाए, भले, बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाए! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******