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तू ढूँडने मुझे निकला !
मैं एक ढलता सा साया ज़मीं के क़दमों में,तू ढूँडने मुझे निकला है आफ़्ताब लिए| नज़ीर क़ैसर
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सर-फिरी मौजें अभी!
कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर ‘सलीम’,सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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ख़ाक उड़ती है हवा!
इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा,मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ !
ये ज़मीं यूँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन,फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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अपने घरों में क़ैद हैं!
पाँव में रिश्तों की ज़ंजीरें हैं दिल में ख़ौफ़ की,ऐसा लगता है कि हम अपने घरों में क़ैद हैं| सलीम कौसर
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ज़िंदा हैं
आज एक बार फिर से अपनी एक रचना, जो हल्के-फुल्के मूड में गंभीर दिखते हुए लिखी गई शेयर कर रहा हूँ- ऊपर से पर्ची नहीं आई, ज़िंदा हैं, लेते हैं हम रोज दवाई, ज़िंदा हैं। प्यार, मोहब्बत, नफरत, बेकद्री, विद्वेष, देख लिया है सब कुछ भाई, ज़िंदा हैं। कई बार ऊपर वाले के थाने में,…
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और कितनी ख़्वाहिशें!
शहर आबादी से ख़ाली हो गए ख़ुश्बू से फूल,और कितनी ख़्वाहिशें हैं जो दिलों में क़ैद हैं| सलीम कौसर