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चाँद के आगे भला!
तुम हो महफ़िल में तो मेरी चश्म-ए-तर देखेगा कौन,चाँद के आगे भला दाग़-ए-जिगर देखेगा कौन| मंज़र भोपाली
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वहाँ क्या भैंस बंधेंगी!
आज कवि सम्मेलनों से संबंधित एक- दो प्रसंग याद आ रहे हैं। शुरू में जब दिल्ली में रहता था तब कवि गोष्ठियों में तो जाना होता ही था, वहीं प्रसिद्ध मंचीय कवियों से शोभित आयोजन भी देखने-सुनने का अवसर मिलता था। जैसे लाल किले का कवि सम्मेलन, जिसके कर्ता-धर्ता उस समय गोपाल प्रसाद व्यास होते…
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आइना देखा करो!
तैश में आने लगे तुम तो मिरी तन्क़ीद पर, इस क़दर हस्सास हो तो आइना देखा करो| मंज़र भोपाली
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ईमान का सौदा करो!
रहनुमा ये दर्स हम को दे रहे हैं आज-कल,बेच दो सच्चाइयाँ ईमान का सौदा करो| मंज़र भोपाली
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हादसों का ख़ौफ़ ले!
ज़िंदगी के नाम-लेवा मौत से डरते नहीं,हादसों का ख़ौफ़ ले कर घर से मत निकला करो| मंज़र भोपाली
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फूल कहते हैं तुम्हें!
ख़ुद को पोशीदा न रक्खो बंद कलियों की तरह,फूल कहते हैं तुम्हें सब लोग तो महका करो| मंज़र भोपाली
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ख़ून से उजला करो!
दुख अँधेरों का अगर मिटता नहीं है ज़ेहन से,रात के दामन को अपने ख़ून से उजला करो| मंज़र भोपाली
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ख़्वाब मत देखा करो!
ज़िंदगी जीने का पहले हौसला पैदा करो, सिर्फ़ ऊँचे ख़ूबसूरत ख़्वाब मत देखा करो| मंज़र भोपाली
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दशहरे से दिवाली से!
वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ’ल्लुक़ था,दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से| कैफ़ भोपाली