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कितने फूलों का सर!
हम ने माना कि महका के घर रख दिया,कितने फूलों का सर काट कर रख दिया| उदय प्रताप सिंह
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उदासी का मुसाफ़िर यारो!
क्यूँ न लौटे वो उदासी का मुसाफ़िर यारो,ज़ख़्म सीने के उसे रोज़ सदा देते हैं| अजय सहाब
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एक और गीत!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- तुमने चाहा था देखोगेमेरी रचनाओं की दुनिया,रुको द्वार पर सजा रहा हूँपीड़ाओं की जगमग लड़ियां| भीतर की दुनिया इतनी रंगीन नहीं,वश में रखना तुमअपने कौतूहल को, पाषाणों के बीच पटकना पड़ता है मन के कोमल भावोंकी इस मखमल को, हतप्रभ मत होनाजब भीतर…
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अफ़्वाह उड़ा देते हैं!
होश में हो के भी साक़ी का भरम रखने को,लड़खड़ाने की हम अफ़्वाह उड़ा देते हैं| अजय सहाब
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सुब्ह होते ही जिन्हें!
रात आई तो तड़पते हैं चराग़ों के लिए,सुब्ह होते ही जिन्हें लोग बुझा देते हैं| अजय सहाब
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जीना भी सिखा देते हैं!
हादसे जान तो लेते हैं मगर सच ये है,हादसे ही हमें जीना भी सिखा देते हैं| अजय सहाब
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हम को सज़ा देते हैं!
जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं,जाने किस बात की वो हम को सज़ा देते हैं| अजय सहाब
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आज बचपन कहीं!
आज बचपन कहीं बस्तों में ही उलझा है ‘सहाब’,फिर वो तितली को पकड़ना वो उड़ाना आए| अजय सहाब
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स्कूल से छुट्टी जो मिले!
आह सहसा कभी स्कूल से छुट्टी जो मिले,चीख़ कर बच्चों का वो शोर मचाना आए| अजय सहाब