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नया तरीका!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नागार्जुन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है नागार्जुन जी की यह कविता – दो हज़ार मन गेहूँ आया दस गाँवों के नामराधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम सौदा पटा…
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तुम भी हो रुस्वाइयों में
मुझे मुस्कुरा मुस्कुरा कर न देखो, मिरे साथ तुम भी हो रुस्वाइयों में| कैफ़ भोपाली
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वही सरकार हो जाए!
मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम,निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं!
वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ,मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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मिरा दीदार हो जाए!
ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की,मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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ज़माने से कहो कुछ!
ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए,हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए| कैफ़ भोपाली
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सियाही ख़ून बन जाए!
सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए,सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए| कैफ़ भोपाली