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टपके हुए आँसू की तरह!
तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह,देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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मैं हूँ इक धूल भरी शाम!
तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन,मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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तू भी हो जाएगा बदनाम!
मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल,तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी
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ज़िंदगी नाम है !
हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत ‘फ़ानी’,ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का| फ़ानी बदायुनी
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अचानक तुम आ जाओ!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री आलोक धन्वा जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। आलोक जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री आलोक धन्वा जी की यह कविता- इतनी रेलें चलती हैंभारत मेंकभीकहीं से भी आ सकती होमेरे पास कुछ दिन रहना इस घर मेंजो…
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जनाज़ा तिरे दीवाने का!
हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में,लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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आँखों में लहू की बूँदें!
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें,सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का| फ़ानी बदायुनी
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यूँ बहकना नहीं अच्छा!
अब इसे दार पे ले जा के सुला दे साक़ी,यूँ बहकना नहीं अच्छा तिरे मस्ताने का| फ़ानी बदायुनी
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आओ देखो न तमाशा!
तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग,आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी