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वे हवाएं खो गई हैं!
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ लेकर मैं कभी जिनको चला था, रास्ते में वे हवाएं खो गई हैं। वे सुकोमल भाव के स्वप्निल बिछौने कूदते वे सृजन के मदमस्त छौने, सफलता की राह पर आगे बढे़ तब सिरफिरी परिकल्पनाएं खो गई हैं। पेट की खातिर यहाँ जीवन जिए हैं…
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टूटता रहता हूँ हर गाम!
मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा ‘शकील’,टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल| शकील आज़मी