Category: Uncategorized
-
किसी ने मुड़ के!
क़लक़* था सब को समुंदर की बे-क़रारी का,किसी ने मुड़ के नदी की तरफ़ नहीं देखा| *अफसोस मंज़र भोपाली
-
घन का गिरि!
आज मैं हिंदी के विख्यात समीक्षक और कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। नामवर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत– घन का गिरि, शिखर स्थित रवि यह सरि वेला !वन – उपवन सुरभि सजग मलय वलय बेला !…
-
कोई तराना कोई!
बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास,कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
दिखा के जलवा!
दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना,नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
जो हो सके तो बदल!
जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना,नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
नवा-ए-तल्ख़ को!
बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है,नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
गुलों को छेड़ के!
गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार,गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
भटक रही है अँधेरे में!
भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात,कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा| अली सरदार जाफ़री
-
ये एक पल है उसे!
अदम हयात से पहले अदम हयात के बा’द,ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा| अली सरदार जाफ़री