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मेरी आँखें मिरी!
आप को देख के जिस वक़्त पलटती है नज़र, मेरी आँखें मिरी आँखों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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कुछ उमीदें भी!
टूट कर ये भी बिखर जाती हैं इक लम्हे में,कुछ उमीदें भी घरोंदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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आरज़ूएँ भी ग़रीबों की!
सहमी सहमी हुई रहती हैं मकान-ए-दिल में,आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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चिड़ियों की तरह!
उड़ के इक रोज़ बहुत दूर चली जाती हैं,घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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घर में रहते हुए !
घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं,लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं| मुनव्वर राना
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सर-ए-दीवार आँखें!
सेहन-ए-ज़िंदाँ में है फिर रात के तारों का हुजूम,शम्अ’ की तरह फ़रोज़ाँ सर-ए-दीवार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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रूह को रोग मोहब्बत!
रूह को रोग मोहब्बत का लगा देती हैं,सेहत-ए-दिल जो अता करती हैं बीमार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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वह तीसरा आदमी कौन है!
आज मैं विख्यात कवि स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। यायावर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। वे फेसबुक पर मेरे मित्र थे। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत यायावर जी की यह कविता – कवि धूमिल को समर्पित एक आदमी देखता है, खोजता है,रचनात्मक संघर्ष…
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हुस्न के चाँद से मुखड़े!
हुस्न के चाँद से मुखड़े पे चमकते तारे, हाए आँखें वो हरीफ़-ए-लब-ओ-रुख़सार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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आँच में अपनी जवानी!
आँच में अपनी जवानी की सुलगती चितवन,शबनम-ए-अश्क में धोई हुई गुलनार आँखें| अली सरदार जाफ़री