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बह नहीं जाना लहर में!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – यह मधुर मधुवंत बेलामन नहीं है अब अकेलास्वप्न का संगीत कंगन की तरह खनका सांझ…
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क्या सितम है कि!
कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं,क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे| जौन एलिया
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सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम!
बे-दिली क्या यूँही दिन गुज़र जाएँगे,सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे| जौन एलिया
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मर्सिया एक फ़क़त!
हम ने कब शेर कहे हम से कहाँ शेर हुए,मर्सिया एक फ़क़त अपनी सदी का लिख्खा| शीन काफ़ निज़ाम