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कैसे-कैसे रूप सलोने
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कैसे-कैसे रूप सलोनेधर संताप मिले,लिए रूप आशीषों काहमको अभिशाप मिले। यह दुनिया है, यहाँ सभी केढंग निराले हैं,भोले लगते प्राणीआफत के परकाले हैं। सोच-समझकर मिलना भाईसब लोगों से तुम जाने कैसा छल कबओढे हुए लिहाफ मिलें। नाट्य मंडली यह दुनियाप्यासी है नोटों कीमंचों के…
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जो तेरे शहर में!
उन्हीं पे सारे मसाइब का बोझ रक्खा है, जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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जो पारसा हो तो!
जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो,हम ए’तिबार का मीज़ान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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हम उस निगाह का!
ये ज़ख़्म-ए-दिल नहीं एहसान की निशानी है,हम उस निगाह का एहसान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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झुलसते ख़्वाबों की!
हमारे पास फ़क़त धूप है ख़यालों की,झुलसते ख़्वाबों की दुक्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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इन आँसुओं का कोई!
इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए,कि हम भी ‘मीर’ का दीवान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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दीवानों से ये मत पूछो!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं मुकेश जी का गाया ये अत्यंत लोकप्रिय गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- दीवानों से ये मत पूछो, दीवानों पे क्या गुज़री है! आशा है आपको ये पसंद आएगा,धन्यवाद। ******
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दिन बौने हो गये!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत- रातें लम्बी हुईंदिन बौने हो गए । ठिगने कद वाले दिनलम्बी परछाइयाँधूप की इकाई…