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गुल हैं मगर !
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाखा चकबस्त बृज नारायण
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मत कर यों बदनाम!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– मत कर यों बदनाम मुझे तू व्यर्थ सहेली बावरी,देखी तक भी नहीं आज…
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जो दाग़ आसमाँ के हैं!
हम सोचते हैं रात में तारों को देख करशमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं चकबस्त बृज नारायण
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पर बड़ी बात पे!
छोटी सी बात पे ख़ुश होना मुझे आता था,पर बड़ी बात पे चुप रहना तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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रिश्ता-ए-नाज़ को!
रिश्ता-ए-नाज़ को जाना भी तो तुम से जाना,जामा-ए-फ़ख़्र पहनना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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सोच को आदाब!
तुम ने समझाए मिरी सोच को आदाब अदब,लफ़्ज़ ओ मअनी से उलझना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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अच्छे शेरों की परख!
अच्छे शेरों की परख तुम ने ही सिखलाई मुझे,अपने अंदाज़ से कहना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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तुमसे हासिल हुआ!
तुम से हासिल हुआ इक गहरे समुंदर का सुकूत,और हर मौज से लड़ना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह
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नक़्श की तरह!
नक़्श की तरह उभरना भी तुम्ही से सीखा,रफ़्ता रफ़्ता नज़र आना भी तुम्ही से सीखा। ज़ेहरा निगाह