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तुझ से इक रिश्ता!
ख़्वाब में तेरा आना-जाना पहले भी था आज भी है,तुझ से इक रिश्ता अन-जाना पहले भी था आज भी है| हस्तीमल हस्ती
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ख़ुद चराग़ बन के!
ख़ुद चराग़ बन के जल वक़्त के अँधेरे में,भीक के उजालों से रौशनी नहीं होती| हस्तीमल हस्ती
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दोस्ती नहीं होती!
दोस्त पे करम करना और हिसाब भी रखना,कारोबार होता है दोस्ती नहीं होती| हस्तीमल हस्ती
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इतनी ख़ूबसूरत ये!
दिल में जो मोहब्बत की रौशनी नहीं होती,इतनी ख़ूबसूरत ये ज़िंदगी नहीं होती| हस्तीमल हस्ती
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कोयल के कानों में कह दी!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अश्वघोष जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।अश्वघोष जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अश्वघोष जी का यह नवगीत– कोयल के कानों में कह दीकुछ बात रस भरीसुधियों में फूल गई आम्र-मंजरी । हरियाले पत्तों की…
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ले गया हमराह अपने!
ले गया हमराह अपने वो मकाँ और बाम-ओ-दर,है नज़र सब कुछ मगर इक बे-मकानी दे गया| नज़र कानपुरी
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फिर से जवानी दे गया!
बज़्म में बे-पर्दा आया मुस्कुरा कर सामने,ना-तवाँ दिल को मिरे फिर से जवानी दे गया| नज़र कानपुरी
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थी ग़ज़ल मेरी बहुत!
थी ग़ज़ल मेरी बहुत बे-रब्त बे-कैफ़-ओ-असर,वो मिरे अशआ’र को अलफ़ाज़-ओ-मा’नी दे गया| नज़र कानपुरी