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अभिमत बदलते हैं!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि इसाक अश्क जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसाक जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है इसाक अश्क जी का यह नवगीत – रंगगिरगिट की तरहअभिमत बदलते हैं । रोज़करते हैं तरफ़दारीअंधेरों कीरोशनी कोलूटने वालेलुटेरों की इसमेंनहीं होते सफल तोहाथ मलते हैं…
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रामकली!
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कब उसके यौवन की धूप ढलीइतना भी नहीं जाने रामकली। सुबह सवेरे हीउठ जाती हैझाडू-पोंछा खूबलगाती है जब तब खाती डांटखूब पगली। धरम-करम कोखूब मानती हैसारे तिथि-त्योहारजानती है, जो भी करते,करते राम भली। मुद्दत से वोसेवक है घर कीसुख की दुआमांगती हैसबकी यही आस्था है…