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फिर से देखेंगे हम सपने!
आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- फिर से देखेंगे हम सपने! सपनीला कुछ पास नहीं हैदिखती कोई आस नहीं हैकिंतु हौसला तो कायम हैबस मन में मधुमास नहीं है। मदिर कल्पना के ये पंछीआतुर एक करिश्मा रचने। सपनों की तो बात निराली, खूब फुदकते डाली-डालीचाहे शाखें सूख रही होंया फिर छाई…
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पुरानी शराब पीता हूँ!
पुराने चाहने वालों की याद आने लगे,इसी लिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ। हसरत जयपुरी
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महँगी शराब पीता हूँ!
मैं उस की आँखों से छलकी शराब पीता हूँ,ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ। हसरत जयपुरी
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मिलने को तो मिलते हैं!
अंदाज़-ए-सितम उन का देखे तो कोई ‘हसरत’,मिलने को तो मिलते हैं नश्तर से चुभोते हैं। हसरत जयपुरी
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सच्चाई की राहों में!
होता चला आया है बे-दर्द ज़माने में,सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोते हैं। हसरत जयपुरी
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मोती से पिरोते हैं!
हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते,बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं। हसरत जयपुरी
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वो ग़ैर की बाँहों में !
हम रातों को उठ उठ के जिन के लिए रोते हैं,वो ग़ैर की बाँहों में आराम से सोते हैं। हसरत जयपुरी
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इसी ज़मीं की अमानत!
इसी ज़मीन में इक दिन मुझे भी सोना है,इसी ज़मीं की अमानत हैं मेरे प्यारे भी| अमजद इस्लाम अमजद