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ले गया हमराह अपने!
ले गया हमराह अपने वो मकाँ और बाम-ओ-दर,है नज़र सब कुछ मगर इक बे-मकानी दे गया| नज़र कानपुरी
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फिर से जवानी दे गया!
बज़्म में बे-पर्दा आया मुस्कुरा कर सामने,ना-तवाँ दिल को मिरे फिर से जवानी दे गया| नज़र कानपुरी
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भोज के बाद पंडित जी!
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से कुछ हल्का फुल्का प्रसंग- आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *******
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अलफ़ाज़-ओ-मा’नी दे गया!
थी ग़ज़ल मेरी बहुत बे-रब्त बे-कैफ़-ओ-असर,वो मिरे अशआ’र को अलफ़ाज़-ओ-मा’नी दे गया| नज़र कानपुरी
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बद-गुमानी दे गया!
बात भी इतनी कि बस उस ने किया मुझ को सलाम,हाँ मगर लोगों के दिल में बद-गुमानी दे गया| नज़र कानपुरी
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कल चौदहवीं की रात थी!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में इब्न-ए-इंशा साहब की लिखी प्रसिद्ध ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह जी ने बड़ी खूबसूरती से गाया है- कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा! आशा है आपको यह पसंद आएगी,धन्यवाद! *******
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गिरे ताड़ से!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ हिंदी नवगीतकार श्री नचिकेता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। नचिकेता जी की कुछ ही रचनाएं मैंने पहले शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नचिकेता जी का यह नवगीत– गिरे ताड़ सेमगर बीच में हीखजूर पर हम अँटके।घर की झोल लगी दीवारों पर हैंचमगादड़ लटकेखूस…
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वो रवानी दे गया!
सर मिरे सीने पे उस ने जब रखा है ज़िंदगी,इस तरह दरिया-ए-दिल को वो रवानी दे गया| नज़र कानपुरी
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आँखों में पानी दे गया!
जाते जाते वो मुझे अपनी निशानी दे गया,ज़िंदगी-भर के लिए आँखों में पानी दे गया| नज़र कानपुरी