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29. मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा, एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया।
अब विंध्याचल परियोजना के क्लबों का ज़िक्र कर लेते हैं। दो क्लब थे वहाँ पर, वीवा क्लब (विंध्याचल कर्मचारी कल्याण क्लब) और विंध्य क्लब। वहाँ समय-समय पर होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा, हिंदी अनुभाग की ओर से कभी-कभी कवि गोष्ठियों का आयोजन भी हम वहाँ करते थे। अधिक प्रतिभागिता वाले कार्यक्रम तो रूसी प्रेक्षागृह…
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28. मन कस्तूरी हिरण हो गया, रेत पड़ी मछली निंदिया!
चलिए आगे बढ़ने से पहले नंद बाबा का थोड़ा सम्मान कर लेते हैं। नंद बाबा, मां-बाप ने इनका नाम रखा था –सच्चिदानंद, इन्होंने बाद में अपनाया एस. नंद और जनता ने प्यार से इनको कहा- नंद बाबा। कारण जो भी रहे हों, विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण करते ही इनकी महाप्रबंधक महोदय से बिगड़ गई। वैसे…
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27. जय गुरूदेव!
विंध्याचल परियोजना में मेरा प्रवास 12 वर्ष का रहा, जो सेवा के दौरान किसी एक स्थान पर सबसे अधिक है, और एनटीपीसी में 22 वर्ष की कुल सेवा भी किसी एक संस्थान में सबसे लंबी सेवा थी। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि मुझ जैसा चंचल चित्त व्यक्ति भी कहीं दीर्घ सेवा सम्मान पा…
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26. इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं!
विंध्याचल परियोजना में शुरू के 3-4 साल बड़े सुकून और आनंद के साथ बीते, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, स्कूलों की प्रगति के लिए पुस्तकों और सामग्रियों का प्रबंध, खेलकूद, कवि सम्मेलन आदि। सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में भी मेरी ऐसी भूमिका बन गई कि एकाध बार ऐसा कोई आयोजन हुआ और मैं बाहर रहा तो…
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25. अखबारों में, सेमीनारों में, जीता है आम आदमी!
जैसा कि मैंने बताया, अब बारी थी मेरे सेवाकाल के अंतिम नियोजक, एनटीपीसी लिमिटेड के साथ जुड़ने की, जहाँ मेरी सेवा भी सबसे लंबी रही। 21 मार्च, 1988 को मैंने एनटीपीसी की विंध्याचल परियोजना में कार्यग्रहण किया, यहाँ मुझे सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन और संचालन का भरपूर अवसर मिला, प्रेम करने वाले ढ़ेर सारे लोग…
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24. और चुकने के लिए हैं, ऋण बहुत सारे!
अब बारी थी, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की ही एक इकाई, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स में कुछ समय प्रवास की, जयपुर के बाद एक बार फिर से राजस्थान में रहने का अवसर मिला था। राजस्थान के लोग बहुत प्रेम करने वाले हैं। लेकिन यह इकाई क्योंकि दिल्ली और जयपुर, दोनों के बहुत नज़दीक है इसलिए यहाँ राजनीति…
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23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!
मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते थे और खदान में काम करते थे। एक मिश्रा जी थे,…
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22. बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी यह हमसे कब हुआ!
हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता का अर्थ कुछ गलत होता है। उनके अलावा एक हिंदी अधिकारी…
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21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी…
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20. बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!
जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं। एक और…