Category: Uncategorized
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90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!
पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह बात अब कर लेता हूँ। कुछ समय पहले प्रसिद्ध अभिनेता विनोद…
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89. हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले!
जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है- मुझे तुमसे कुछ भी न…
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88. गोद लिए हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय!
आज की बात शुरू करते समय मुझे चुनाव के समय का एक प्रसंग याद आ रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के विरुद्ध डॉ. कर्ण सिंह चुनाव लड़ रहे थे। दोनों श्रेष्ठ नेता हैं और एक दूसरे का आदर भी करते हैं। एक चुनावी सभा में डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि वाजपेयी जी इस…
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87. आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की
आज भारत की दो महान विभूतियों की जयंती है, एक तो जिन्हें हम राष्ट्रपिता के नाम से जानते हैं और दूसरे भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी। इन महापुरुषों की जयंती आज देश मना रहा है। राजनीति के क्षेत्र से ऐसे अनेक और लोग हैं जिनको ‘भारत रत्न’ का दर्जा दिया गया, मैं आज एक…
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86. मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था!
आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन…
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85. ये दिल्ली है बाबू!
दिल्ली में मेरा जन्म हुआ, 30 वर्ष की आयु तक मैं दिल्ली में ही रहा, शुरू की 2-3 नौकरियां भी वहीं कीं और सेवानिवृत्ति के बाद भी लगभग 7 वर्ष तक, दिल्ली के पास गुड़गांव में रहा। इसलिए कह सकता हूँ कि दिल्ली को काफी हद तक जानता हूँ, और मैंने दिल्ली के अपने अनुभव…
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84. जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया
एनटीपीसी में अपनी सेवा के दौरान बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़ा रहा और इस सिलसिले में अनेक जाने-माने कवियों, कलाकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बहुत से श्रेष्ठ कवियों से तो मित्रता हो गई थी, बहुतों की कविताओं/गीतों को मैंने अपने ब्लॉग में उद्धृत भी किया है। कुछ अलग किस्म के…
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83. काम नए नित गीत बनाना
काफी अरसा बीत गया यह ब्लॉग लिखते-लिखते, जैसा बाबा तुलसीदास जी ने कहा- स्वांतः सुखाय। सोशल मीडिया के ये मंच, जो विद्वानों से भरे पड़े हैं, वहाँ सोचा कि अनुभूतियों की बात ज्यादा से ज्यादा करूं। ऐसे ही एक दिन खयाल आया कि ब्लॉग लिखना शुरू किया जाए। इस बहाने अपनी कुछ कविताएं भी, जो…
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82. कल और आएंगे, नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले!
अज्ञेय जी की एक कविता है-‘नए कवि से’, काफी लंबी कविता है, उसका कुछ हिस्सा यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ- आ, तू आ, हाँ, आ, मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर, मिटाता उसे, मुझे मुँह भर-भर गाली देता- आ, तू आ। तेरा कहना है ठीक: जिधर मैं चला नहीं वह पथ था: मेरा आग्रह…
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81. सरेआम अमानवीयता
फेसबुक पर एक वीडिओ देखा जिसमें एक युवक को कई लोग मिलकर लाठियों से पीट रहे हैं और तमाशबीनों की भारी भीड़ चारों तरफ खड़ी इस दृश्य को देख रही है। बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य था, ऐसा लगता ही नहीं था कि उस युवक को पीटने वाले इंसान थे, और चारों तरफ से घेरकर…