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लहजे को भी बाज़ारी रखो!
ले तो आए शाइरी बाज़ार में ‘राहत’ मियां,क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो| राहत इन्दौरी
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न मैं चुप हूँ न गाता हूँ !
आज बिना किसी भूमिका के, हमारे लोकप्रिय पूर्व प्रधान मंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी एक सहृदय मनुष्य और मंजे हुए राजनेता होने के साथ ही एक श्रेष्ठ कवि भी थे| लीजिए प्रस्तुत है वाजपेयी जी की एक कविता, जो मनाली…
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पत्थर ज़रा भारी रखो!
ये हवाएं उड़ न जाएं ले के काग़ज़ का बदन,दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो| राहत इन्दौरी
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ख़्वाब मेयारी रखो!
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ायम रहे,नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो| राहत इन्दौरी
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मौत से यारी रखो!
एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो,दोस्ताना ज़िंदगी से, मौत से यारी रखो| राहत इन्दौरी
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सफ़र जारी रखो!
राह के पत्थर से बढ़कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें,रास्ते आवाज़ देते हैं, सफ़र जारी रखो| राहत इन्दौरी
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होंठों पे चिंगारी रखो!
आँख में पानी रखो, होंठों पे चिंगारी रखो,ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो| राहत इन्दौरी
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर – बादल और लहरें
एक बार फिर बारी है पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने की| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले प्रस्तुत है…
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बेनाम ख़बर के हम हैं!
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम,हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं | निदा फ़ाज़ली