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कि अब तो लोग!
तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है,कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना
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खिलखिला के कैसे!
तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ,कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम* निकलते हैं|*कष्ट मुनव्वर राना
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बहारों ने मेरा चमन लूटकर!
आज एक बार फिर से मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मुकेश जी का बहुत प्यारा गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- बहारों ने मेरा चमन लूटकर खिज़ाओं को इल्ज़ाम क्यों दे दिया। आशा है आपको पसंद आएगा, धन्यवाद।
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मिलते हैं चाहने वाले!
कहाँ हर एक को मिलते हैं चाहने वाले,नसीब वालों के गेसू में ख़म निकलते हैं| मुनव्वर राना
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गीत अपाहिज!
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत अपाहिजमन में भटकेकहीं नहीं पहुंचे दुनिया में! रहे छिपाए दर्द हमेशाकभी न लोगों तक पहुंचायाऔर दर्द देने वालों ने जी भरकर उत्पात मचाया, अब ये दर्द सजाएंगे हमलोगों के समक्ष बगिया में, दर्द बांटने वाले जानेंअब न ये कारोबार चलेगा, उनके कृत्य उजागर…
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यही है ज़िद तो !
यही है ज़िद तो हथेली पे अपनी जान लिए,अमीर-ए-शहर से कह दो कि हम निकलते हैं| मुनव्वर राना
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हमारे जिस्म के अंदर!
हमारे जिस्म के अंदर की झील सूख गई,इसी लिए तो अब आँसू भी कम निकलते हैं| मुनव्वर राना
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मसर्रतों के ख़ज़ाने!
मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं,किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं| मुनव्वर राना
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कुछ बात थी जो!
कुछ बात थी जो लब नहीं खुलते थे हमारे,तुम समझे थे गूँगों के ज़बानें नहीं होतीं| मुनव्वर राना