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चंदन वन डूब गया 4
दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,हंसने वालों में रहकर मुस्काना होगा,घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया। किशन सरोज
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चंदन वन डूब गया 3
सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,काहे का रोना जो बीती सो बात गई,मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया। किशन सरोज
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चंदन वन डूब गया 2
माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा। किशन सरोज
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चंदन वन डूब गया!
छोटी से बड़ी हुई तरुओं की छायाएं,धुंधलाई सूरज के माथे की रेखाएं,मत बांधो आंचल में फूल चलो लौट चलें,वह देखो, कोहरे में चंदन वन डूब गया। किशन सरोज
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फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह!
एक बार फिर से आज मैं भारतीय उप महाद्वीप के मशहूर शायर क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| वास्तव में ये कवि, शायर और कलाकार ही होते हैं जिनको देश की सीमा में नहीं बांधा जा सकता| क़तील साहब की बहुत सी ग़ज़लों को अनेक भारतीय और पाकिस्तानी गायकों ने गाया…
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वो अठखेलियां कहाँ राही!
नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए। मिलाप चंद राही
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तेरे शहर से गुज़रते हुए!
ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए। मिलाप चंद राही
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लरजना ज़ुबां का!
रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए। मिलाप चंद राही