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सबरस जी के दुमदार दोहे!
आज मैंअपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक कवि श्री सबरस जी के कुछ ‘दुमदार दोहे’ जो मैंने बहुत पहले कवि सम्मेलन में सुने थे, (मुझे उनका पूरा नाम भी याद नहीं है) जैसे ये हास्य के दोहे मुझे याद हैं, मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, मेरा उद्देश्य केवल उनकी इस रचना को जनता तक…
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यही इंतिज़ार होता!
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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सात दिन हम पे भी !
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र,सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब
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हमने कब मौसम का!
आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।हम सदा जिए झुककर, सामने हवाओं के,उल्टे ऋतुचक्रों, आकाशी घटनाओं के,अपना यह हीनभाव, साथ सदा आया है। छंद जो मिला हमको, गाने कोघायल होंठों पर तैराने को,शापित अस्तित्व और घुन खाए सपने ले,मीन-मेख क्या करते-गाना…
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शम्अ हर रंग में!
ग़म-ए-हस्ती का ‘असद‘ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब
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आशिक़ी सब्र-तलब!
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब
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आह को चाहिए इक!
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब
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अशोक वाटिका प्रसंग
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में मुकेश जी द्वारा किए गए श्रीरामचरित मानस के पाठ में से सुंदर कांड में से अशोक वाटिका से संबंधित हनुमान जी की लीला का कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद्।
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जिसने नज़र उठाई!
जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ,इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए| दुष्यंत कुमार