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अल्लाह का घर लगता है!
बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं, दिल मेरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है| बशीर बद्र
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तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है!
मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा, ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है| बशीर बद्र
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छूते हुए डर लगता है!
सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है, बा-वज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है| बशीर बद्र
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प्रक्रिया
आज श्री भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मैं यायावर जी से कभी मिला तो नहीं हूँ परंतु वे मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, अक्सर वे अपने मूल्यवान आलेख, कविताएं और संस्मरण शेयर करते रहते थे| उनके साथ कई बार फ़ेसबुक पर कुछ चर्चाओं में भाग लिया काफी अच्छा लगता था| रेणु…