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गुजरे बरसों बरस!
श्री राम कुमार कृषक जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि हैं| मुझे स्मरण है कि मैंने दिल्ली में बहुत समय पहले, उनके साथ कुछ कवि गोष्ठियों में भाग लिया था, उनके साथ उनके मित्र श्री पुरुषोत्तम प्रतीक भी गोष्ठियों में आते थे| कृषक जी का एक गीत उस समय बहुत प्रसिद्ध था- ‘बागड़ की छोकरियाँ’…
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आबो-हवा गोकुली हुई!
मुरली सा कोई शख्स बजा जब भी ध्यान में,मेरे बदन की आबो-हवा गोकुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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देखती रही खिड़की खुली हुई!
लट्टू की तरह घूम के चौराहा सो गया,चुपचाप देखती रही खिड़की खुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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धूप को बरगद कोई मिला!
दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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शहर की भाषा धुली हुई!
कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया!
अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई| सूर्यभानु गुप्त