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उठ मेरी बेटी सुबह हो गई!
लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता प्रस्तुत है| जैसा कि मैंने पहले भी उनके बारे में लिखा है वे साप्ताहिक समाचार पत्रिका- ‘दिनमान’ के संपादक मण्डल में थे और हिन्दी के श्रेष्ठ कवि थे| कुछ कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति वास्तव में अद्वितीय रही है| आज की कविता…
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पहचाना सा लगे है मुझे!
मैं सोचता था कि लौटूंगा अजनबी की तरह,ये मेरा गांव तो पहचाना सा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर
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उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ!
मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ,वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर
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कोई झांकता लगे है मुझे!
मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आंखों में,तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे| जां निसार अख़्तर