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निगाह-ए-यार की तरह!
वो तो हैं कहीं और मगर दिल के आस पास,फिरती है कोई शै निगाह-ए-यार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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दौलत-ए-बेदार की तरह!
इस कू-ए-तिश्नगी में बहुत है के एक जाम,हाथ आ गया है दौलत-ए-बेदार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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हर निगाह ख़रीदार की तरह!
हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह,उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह| मजरूह सुल्तानपुरी
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तुम जहाँ कहो!
आज श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह जी के काफी नजदीक थे, वे साहित्य और संस्कृति से जुड़े अनेक पदों पर भी आसीन रहे| भोपाल के भारत भवन की परिकल्पना भी वाजपेयी जी की ही थी जो आज साहित्य और…
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घूँट को कड़वा किया न जाए!
हर वक़्त हमसे पूछ न ग़म रोज़गार के,हम से हर घूँट को कड़वा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए!
ईनाम हो, ख़िताब हो, वैसे मिले कहाँ,जब तक सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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इस तरह का तमाशा किया न जाए!
लहजा बना के बात करें उनके सामने,हमसे तो इस तरह का तमाशा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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किसी पे भरोसा किया न जाए!
हर-चंद एतिबार में धोखे भी है मगर,ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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हर बात पे झगड़ा किया न जाए!
उनकी रविश जुदा है हमारी रविश जुदा,हमसे तो हर बात पे झगड़ा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
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सूना किया न जाए!
उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम,पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर