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बस्ती के चौबारों में!
हर पनघट पर मेरे फ़साने, चौपालों पर ज़िक्र मेरा,मेरी ही बातें होती हैं बस्ती के चौबारों में। नक़्श लायलपुरी
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इतना दर्द कहाँ से आया!
गीत है या फ़रियाद किसी की, नग़मा है या दिल की तड़प,इतना दर्द कहाँ से आया साज़ों की झंकारों में। नक़्श लायलपुरी
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चाँदी जैसी लहरें गिरती!
जाने कितनी नदियों को धनवान बनाया झरनों ने,चाँदी जैसी लहरें गिरती देखी हैं कोहसारों में। नक़्श लायलपुरी
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मुझको चुनवा दो दीवारों में!
लोग मुझे पागल कहते हैं गलियों में बाज़ारों में।मैंने प्यार किया है मुझको चुनवा दो दीवारों में। नक़्श लायलपुरी
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इक कली खिल गई एक मुरझा गई!
मौत और ज़िन्दगी क्या हैं इसके सिवा,इक कली खिल गई एक मुरझा गई। नक़्श लायलपुरी
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नवनिर्माण का संकल्प!
नवगीत आंदोलन के शिखर पुरूष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत एक तरह से सभी रचनाकारों और सजग नागरिकों की तरफ से एक संकल्प गीत है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर! यहाँ राह अपनी बनाने…