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आकाश-सी छाती तो है!
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है| दुष्यंत कुमार
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जा के बतियाती तो है!
निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है| दुष्यंत कुमार
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उस भोर तक जाती तो है!
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है| दुष्यंत कुमार
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गूँगी ही सही, गाती तो है!
एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है| दुष्यंत कुमार
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भीगी हुई बाती तो है!
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो,इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है| दुष्यंत कुमार
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लहरों से टकराती तो है!
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है| दुष्यंत कुमार
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इतने बरसों बाद!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत…
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हवा का गुज़र नहीं होता!
मैं उस मकान में रहता हूँ और ज़िंदा हूँ,‘वसीम’ जिसमें हवा का गुज़र नहीं होता। वसीम बरेलवी