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कौन रखता है मज़ारों का हिसाब!
जिस्म से रूह तलक रेत ही रेतन कहीं धूप न साया न सराब,कितने अरमान हैं किस सहरा मेंकौन रखता है मज़ारों का हिसाब| कैफ़ी आज़मी
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अब रोज़ ही आ जाते हैं!
रोज़ बसते हैं कई शहर नएरोज़ धरती में समा जाते हैं,ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मीवो भी अब रोज़ ही आ जाते हैं| कैफ़ी आज़मी
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उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ!
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगेफिर वहीं लौट के आ जाता हूँ,बार-हा तोड़ चुका हूँ जिनकोउन्हीं दीवारों से टकराता हूँ| कैफ़ी आज़मी
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खंडहर के प्रति- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
छायावाद युग के एक स्तंभ महाप्राण निराला, जी हाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| निराला जी का काव्य और उनका रचनाकाल हिन्दी कविता के विकास क्रम में एक महत्वपूर्ण समय है| निराला जी की अनेक कविताएं हमें याद आती हैं जैसे भिक्षुक के बारे में उनकी कविता- ‘वह…
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किसान- मैथिलीशरण गुप्त
आज मैं स्वर्गीय मैथिलीशरण ‘गुप्त’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| ‘गुप्त’ जी को राष्ट्रकवि की भी उपाधि प्रदान की गई थी, उन्होंने हमारे धार्मिक, सांस्कृतिक आख्यानों पर आधारित बहुत से मूल्यवान काव्य लिखे हैं, जिनमें रामायण और महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण पात्रों पर आधारित काव्य भी शामिल हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है,…