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धूप को बरगद कोई मिला!
दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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शहर की भाषा धुली हुई!
कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया!
अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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उदास करने की ज़िद पर तुली हुई!
मुझको उदास करने की ज़िद पर तुली हुई,क्या चीज़ है ये मेरे लहू में घुली हुई| सूर्यभानु गुप्त
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बिके अभावों के हाथों !
आज फिर से मैं, मेरे लिए गुरु तुल्य रहे मधुर गीतकार और अत्यंत सरल हृदय व्यक्ति स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी के गीत मैं उस समय से गुनगुनाता रहा हूँ जब मेरी कविता में रुचि विकसित हुई थी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंअर बेचैन जी का…
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मेरे घर का रुख़ भी कर लेती!
कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती, इधर पहुँची, उधर पहुँची, यहाँ आई, वहाँ आई| मुनव्वर राना
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घरौंदे तो घरौंदे, चटानें टूट जाती हैं!
घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं, उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई| मुनव्वर राना
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बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई!
क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता, ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई| मुनव्वर राना
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न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई!
मेरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी, तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई| मुनव्वर राना
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परदेस ले जाएगी फिर शायद!
किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद, उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई| मुनव्वर राना