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हर चीज़ नज़र आएगी बेमा’नी सी!
पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे-मा’नी सी, और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे!
हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं, छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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सिमट जाएँगे सारे रस्ते!
शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते, बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे!
इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना, घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे!
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे, हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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कुंठा!
स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मन में पल रही कुंठा को इस कविता में एक पौराणिक चरित्र के माध्यम से चित्रित किया गया है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता – मेरी कुंठारेशम के कीड़ों-सीताने-बाने बुनती,तड़प तड़पकरबाहर आने को सिर धुनती,स्वर सेशब्दों सेभावों सेऔ’ वीणा…
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ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए!
किसी को ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए, बुरी हो चाहे भली हो मगर ख़बर में रहो| राहत इन्दौरी
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आग लगी हो तो अपने घर में रहो!
जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद, गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो| राहत इन्दौरी
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कभी दिल कभी नज़र में रहो!
कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो, ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो| राहत इन्दौरी