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वर्षान्त!
आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और जैसा मैंने पहले भी लिखा है भोपाल में निर्मित भारत भवन साहित्य एवं संस्कृति कर्मियों के लिए उनकी अमूल्य भेंट है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…
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ज़ेहन की आवारगी से हम!
शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था, ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम| निदा फ़ाज़ली
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मिलने लगे हर किसी से हम!
अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी, मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम| निदा फ़ाज़ली
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मिल आए किसी से हम!
कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे, मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम| निदा फ़ाज़ली
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आइने को लगे अजनबी से हम!
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम, ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम| निदा फ़ाज़ली
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पास से देखोगे अकेला होगा!
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक, जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा| निदा फ़ाज़ली
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कभी तोड़ के देखा होगा!
मिरे बारे में कोई राय तो होगी उसकी, उसने मुझको भी कभी तोड़ के देखा होगा| निदा फ़ाज़ली
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छोड़ आए वो दरिया होगा!
प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली, जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा| निदा फ़ाज़ली
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रौशनी ख़त्म न कर-
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे, रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा| निदा फ़ाज़ली
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मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा!
उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा, वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा| निदा फ़ाज़ली