बे-चेहरगी की भीड़ में!

बे-चेहरगी की भीड़ में गुम है हर इक वजूद,
आईना पूछता है कहाँ ख़द्द-ओ-ख़ाल है|

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

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