प्रस्तुत है आज की यह रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कुछ दिन रहे छलावे में हम
कुछ दिन रहे भुलावे में,
कुछ तो सच है साथ चल रहे
लोगों के इस दावे में।
मंज़िल की लालसा हमेशा
हम भी रखते रहे मगर
भटके रहे अधिकतर हम बस
मौसम के बहकावों में.
सुनते हैं सबकी बातें हम
पूरे ध्यान सहित लेकिन
हमें खींच ले जाता है मन
लालच में, उकसावे में।
जीवन में अभाव कोई भी
खलता है, सच है लेकिन
प्रेमरहित प्राणी जीता है
सबसे बडे अभावों में।
आज के लिए इतना ही,
धन्यवाद।
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