शम्अ हर रंग में जलती है!

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक|
‘
मिर्ज़ा ग़ालिब

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