ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र,
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक|
मिर्ज़ा ग़ालिब
भारी हैं सहर होते तक!
One response to “भारी हैं सहर होते तक!”
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Wah-wah🤍
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A sky full of cotton beads like clouds
Wah-wah🤍
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