गर्दन पर, कुहनी पर!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत-

गर्दन पर, कुहनी पर,
जमी हुई मैल-सी ।
मन की सारी यादें
टूटे खपरैल-सी ।

आलों पर जमा हुए
मकड़ी के जाले,
ढिबरी से निकले
धब्बे काले-काले,
उखड़ी-उखड़ी सांसें है
बूढ़े बैल-सी ।

हम हुए अन्धेरों से
भरी हुई खानें,
कोयल का दर्द यह
पहाड़ी क्या जाने,
रातें सभी हैं
ठेकेदार की रखैल-सी ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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