आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
यायावर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। उनके निधन से पहले काफी समय तक हम फेसबुक के माध्यम से आपस में चर्चा करते थे।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत यायावर जी की यह कविता-

बादल भाई!
तुम आए और दस दिनों तक जमे रहे
झर-झर झरते रहे
इतनी पीड़ा और इतने आँसू
कि भींग गई झोपड़ी की पूरी ज़मीन
भींग गए टाट और बोरे
चूल्हे की आग भी बुझ गई
भूख ने
पेट के चूहों को भयानक बना दिया
कहाँ जाता?
कहाँ खाता?
बादल भाई!
गरजो-मलको-बरसो
पर हम गरीबों पर दया भी करो
देखो
गली का कीचड़ बह कर
सीधे दरवाज़े के भीतर घुसा आ रहा है
पूरे घर में रेंग रहे हैं केंचुए
उछल रहे हैं मेंढक
हम घर के लोग भी
केंचुए और मेंढक हो गए हैं
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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