बूढ़ी माँ!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत-

अपनी चिट्ठी बूढ़ी माँ
मुझसे लिखवाती है
जो भी मैं लिखता हूँ
वह कविता हो जाती है ।

कुशल-क्षेम पूरे टोले का
कुशल-क्षेम घर का
बाट जोहते मालिक की
बेबस चर-चाँचर का ।
इतनी छोटी-सी पुर्जी पर
कितनी बात लिखूँ
क़ाबिल बेटों के हाथों
हो रहे अनादर का ।

अपनी बात जहाँ आई
बस, चुप हो जाती है
मेरी नासमझी पर यों ही
झल्ला जाती है ।

कभी-कभी जब भूल
विधाता की, मुझको छेड़े
मुझे मुरझता देख
दिखाती सपने बहुतेरे ।
कहती-तुम हो युग के सर्जक
बेहतर ब्रह्मा से
नीर-क्षीर करने वाले
हो तुम्हीं हंस मेरे ।

फूलों से भी कोमल
शब्दों से सहलाती है
मुझे बिठाकर राजहंस पर
सैर कराती है ।

कभी देख एकान्त
सुनाती कथा पुरा-नूतन
ऋषियों ने किस तरह किए
श्रुति-मन्त्रों के दर्शन ।
कैसे हुआ विकास सृष्टि का
हरि अवतारों से
वाल्मीकि ने रचा द्रवित हो
कैसे रामायण ।

कहते कहते कथा
शोक-विह्वल हो जाती है ।
और तपोवन में अतीत के
वह खो जाती है ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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