आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत-

हम तो निर्जन के खंडहर हैं।
जीवन का साथी सूनापन,
उदासीनता का आराधन;
प्रिय के अधरों से चिर-बंचित
वंशी के मर्माहत स्वर हैं।
हम तो…
इच्छाओं के बूढ़े विषधर,
हमें समझते हैं अपना घर;
जन्म-मरण के हाथों निर्मित
चल-चित्रों के मध्यांतर हैं।
हम तो…
नभ-चुम्बी प्रासाद रहें ये,
आजीवन आबाद रहें ये;
हम जो कुछ हैं, जैसे भी हैं,
जो भीतर हैं, सो बाहर हैं।
हम तो…
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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