आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रेम शर्मा जी का यह नवगीत-

(एक शोक-गीत)
वही
कुँहासा,
वही अँधेरा,
वही
दिशाहारा-सा जीवन,
इतिहासों की
अन्ध-शक्तियाँ,
जाने हमें
कहाँ ले जाएँ ?
अट्टहास
करता समुद्र है
जमुहाई लेते पहाड़ हैं,
एक भयावह
जल-प्रवाह में
समाधिस्थ होते कगार हैं,
दुविधाग्रस्त,
मन:स्थितियाँ हैं,
विपर्य्यस्त है जीवन-दर्शन,
एक घूमते
हुए वृत्त पर
ऊँघ रही अनथक यात्राएँ ।
चन्दन-केसर,
कमल-नारियल,
शायद अब निर्वंश रहेंगे,
गूँगी होंगी
सभी ऋचाएँ,
अधरों पर विष-दंश रहेंगे,
रौंदे हुए
भोजपत्रों पर
सिसक रहे सन्दर्भ पुरातन ,
बूढ़े
बोधिवृक्ष के नीचे
रूधिरासिक्त हैं परम्पराएँ ।
अन्धकार में
डूब चुकी हैं
सूर्य-वंशजा अभिलाषाएँ,
हम सबके
शापित ललाट पर
खिंची हुई हैं मृत रेखाएँ,
मरणासन्न
किसी रोगी-सा
अस्तोन्मुख
साँस्कृतिक जागरण
ठहर गई हैं
खुली पुतलियाँ
जड़ीभूत हैं रक्त-शिराएँ ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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