आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
शुक्ल जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता-

फूल जब फूलते हैं वृक्षों में
आँखें चुपचाप उधर जैसे आभार में
ऊपर उठ जाती हैं।
बादल जब छाते हैं, थोड़ा गहराते हैं
हम विनीत मस्तक यह अपना
उठाते हैं।
दूर्वादल पैरों को जब-जब सहलाता है
कितना संकोच-भार
मन में खिंच आता है-
आभारी अपने में खोए कुछ
देखते, वह क्या है भीतर तक
मन में भर आता है।
वैसे तो सीमा नहीं दृष्टि की
लेकिन जो ऊपर है
और जो नीचे है-
यहाँ ऎन सामने
हम पर कुछ बरसाता-सरसाता,
उससे एक अलग ही
नाता है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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