शीशा-ए-मय में ढले!

बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब,
शीशा-ए-मय में ढले सुब्ह के आग़ाज़ का रंग|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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