राही से!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

माचवे जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रभाकर माचवे जी का यह गीत-

इस मुसाफ़िरी का कुछ न ठिकाना भइया !
याँ हार बन गया अदना दाना, भइया ।
है पता न कितनी और दूर है मंज़िल
हम ने तो जाना केवल जाना, भइया !

तकरार न करना जाना है एकाकी
हमराह बचेगा कौन भला अब बाक़ी
जब सम्बल भी सब एक-एक कर छूटता
बस बची एक झाँकी उन नक़्शे-पा की ।

छूट चले राह में नए-पुराने साथी
मिट गई मार्गदर्शक यह कम्पित बाती
नंगी प्रकृति वीरान भयावह आगे
मैं जाता हूँ, आओ, हो जिस की छाती !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “राही से!”

  1. यह एक खूबसूरत कविता है जो जीवन की यात्रा, हमारे साथी लोगों और भाग्य की अनिश्चितता के बारे में बताती है। इसके शब्द चिंतन, एकांत और गहन भावों को व्यक्त करते हैं। प्रभाकर माछवे की इस रचना को साझा करने के लिए धन्यवाद।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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