आज की रचना- ऐसा लगा कि किसी आत्मा ने मेरे भीतर प्रवेश किया और मुझसे अपने बारे में यह कविता लिखवा ली, जैसी है प्रस्तुत है –
हाल जर्जर
चाल बदतर
आंख में डोरे गुलाबी
मैं शराबी.
जो कमाया फूंक डाला
बहुत लोगों ने संभाला
किंतु आखिर हो गया अब
दूर हाथों से निवाला
खो गई है कब न जाने
आचरण की सहज चाबी.
राह सीधी हो भले ही
चाल मेरी किंतु टेढ़ी
मुक्त हूं पर आचरण ही
बना है दुर्दांत बेड़ी
दूर होते जा रहे सब
माँ-पिता भाई औ भाभी.
कब तलक लेकर चलेगा
मुझे जीवन, साध अवयव
कभी गिरकर उठ न पाऊँ
लग रहा यह बहुत संभव
मिलेगी राहत सभी को
यदि तिरोहित हो गया भी.
यह नशे में लिप्त जीवन
बेसबब आवारगी भी
क्या मिला तन को जलाकर
छीनकर खुशियाँ सभी की
बंधु यह जीवन नहीं है
है नहीं इंसानियत भी.
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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