अभी शुमार के क़ाबिल!

अभी शुमार के क़ाबिल हैं ज़ख़्म-ए-दिल मेरे,
अभी वो दुश्मन-ए-जाँ मेहरबान कुछ कम है|

मंज़र भोपाली

One response to “अभी शुमार के क़ाबिल!”

  1. क्या खूब शेर है….👌👌👌
    ज़ख़्मों की गिनती से अधिक, उस बेरुख़ी की गहराई बयान करता है जो अभी पूरी तरह मेहरबान भी नहीं हुई। दर्द और विडंबना को इतनी सादगी से कहना ही इस शेर की खूबसूरती है। 🌹

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