सुबह-सुबह!

आज मैं जनकवि के नाम से विख्यात वरिष्ठ कवि स्वर्गीय बाबा नागार्जुन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

नागार्जुन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बाबा नागार्जुन जी की यह कविता-

सुबह-सुबह
तालाब के दो फेरे लगाए

सुबह-सुबह
रात्रि शेष की भीगी दूबों पर
नंगे पाँव चहलकदमी की

सुबह-सुबह
हाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुए
माघ की कड़ी सर्दी के मारे

सुबह-सुबह
अधसूखी पतइयों का कौड़ा तापा
आम के कच्चे पत्तों का
जलता, कड़ुवा कसैला सौरभ लिया

सुबह-सुबह
गँवई अलाव के निकट
घेरे में बैठने-बतियाने का सुख लूटा

सुबह-सुबह
आंचलिक बोलियों का मिक्स्चर
कानों की इन कटोरियों में भरकर लौटा
सुबह-सुबह

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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3 responses to “सुबह-सुबह!”

  1. सुंदर कविता।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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