जगह-जगह दरवाज़े हमारे!

आज मैं मेरे वरिष्ठ साथी और श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

नवीन सागर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता-


दीवारें सिर्फ छप्‍पर साधने के लिए थीं
जगह-जगह दरवाज़े हमारे
खुले हुए थे
खिड़कियाँ थीं
बारजे थे आँगने थे और छतें
सड़कों पर हम अक्‍सर मिल जाते थे।

सुनने और कहने के लिए जो शब्‍द थे
उनमें अजन्‍में शब्‍दों की बड़ी गूँज थी
दूर-दूर की आवाज़ें
हमारे पास प्रतिध्‍वनि की तरह आती थीं
हम खोए हुए अक्‍सर अपने आर-पार आते-जाते थे।

हमारी मृत्‍यु होती थी
जन्‍मों से भरे इस संसार में हम
बार-बार जन्‍म लेते थे।
हम खुले में लेट जाते थे तारे देखते थे
धूल पर उँगलियों से लकीरें खींचते थे
नाम लिखते थे।

धरती जहाँ से पेड़ बनकर आना चाहती थी
वहाँ से हट जाते थे
और चिड़ियों के भीतर से गाते थे।

अब एक पुरानी बस्‍ती
ख़स्‍ताहाल मकान गलियों के मुहाने
भारी सदमे के झटपुटे में ढह रहे हैं।

हम एक गली में हैं लावारिस
चील कौवे धसकती मुँडेरों पर बैठे हैं
गर्दनें टेढ़ी किए।

एक टूटी हुई खिड़की
हवा में झूल रही है
तारों की अवाक दूरियॉं बुझने-बुझने को हैं।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “जगह-जगह दरवाज़े हमारे!”

  1. यह एक अत्यंत गहन और भावुक कविता है। यह उस दौर की बात करती है जब लोग एक-दूसरे के करीब थे, खुले दरवाज़े और खिड़कियाँ थीं, और कैसे वह दुनिया धीरे-धीरे लुप्त हो गई। इसके चित्रण में गहरा दुख है, लेकिन साथ ही जीवन, प्रकृति और यादों का एक सुंदर प्रतिबिंब भी है। इस विशेष रचना को साझा करने के लिए धन्यवाद।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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