चाहत है चूल्हे पर चढ़े!

आज मैं श्रेष्ठ कवि नचिकेता जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

नचिकेता जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

आज प्रस्तुत है नचिकेता जी का यह नवगीत-

चाहत है
चूल्हे पर चढ़े
तवे की आँच बनूँ।
अभी पकी रोटी का
जीवन से सम्वाद बनूँ
जांगर की ख़ातिर कुट्टी
चुन्नी की नाद बनूँ
तेज़ भूख की बेचैनी का
तीआ-पाँच बनूँ।

मैं हथिया की
खड़ी फ़सल के लिए
झपास बनूँ
कृषक-बहू की आँखों में
झमका उल्लास बनूँ
या सपनों के मृगछौने की
सहज कुलाँच बनूँ।

राखी, करवाचौथ, तीज
जितिया के गीत बनूँ
अभी महे मट्ठे पर
छहलाया नवनीत बनूँ
करमा, गरबा, घूम्मर, बीहू
छाऊ नाच बनूँ।

मैं चट्टानें तोड़ उगी
दूबों की ओज बनूँ
फटे-चिते पैताबे में
पाँवों की खोज बनूँ
इक इज्ज़त,आज़ादी की
रक्षा की जाँच बनूँ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

5 responses to “चाहत है चूल्हे पर चढ़े!”

  1. बहुत सुंदर कविता।

    Liked by 2 people

    1. हार्दिक धन्यवाद जी

      Liked by 2 people

  2. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a Reply